शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

कौन आया क्या बोल गया
कानों में डर घोल गया
वक़्त पे काम की बात न की
मोती भी बेमोल गया
अवसर को पहचान के वो
उलझी गाँठे खोल गया
कथ्य तो है पुरज़ोर, मगर
छन्दों का भूगोल गया
स्थिर को मिली मंज़िल 'दरवेश'
था जो डावांडोल, गया

6 टिप्‍पणियां:

  1. कौन आया क्या बोल गया
    कानों में डर घोल गया
    वक़्त पे काम की बात न की
    मोती भी बेमोल गया

    सुंदर प्रस्तुति

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  2. दरवेश जी, पिछले काफी दिनों से आपको ढूंड रहा था.
    आदरणीय बलबीर राठी जी ने आपके बारे में बताया था. आज आपका ब्लॉग देख ख़ुशी हुई.

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  3. कृपया कमेन्ट बॉक्स में शब्द पुष्टिकरण(Word Verification) हटा दें.

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  4. BAHUT KHUSHEE HUYEE APAKA BLOG DEKH KAR GAZAL KE BAHANE PATRIKA MANGVANE KE LIYE KISE LIKHANA HOGA? AGAR BATA DEN TO KRIPA HOGEE. DHANYAVAAD JUNE ME INDIA AA JAOONGEE TO IS PATE PAR PATRIKA CHAHIYE
    NIRMLA.KAPILA
    HO. NO. 558-A\ 1 SHIVALIK AVENUE
    NAYA NANGAL --140126 [PUNJAB]USAKEE KEEMAT BHEE BATA DEN KRIPA HOGI DHANYAVAAD SHUBHAKAMANAYEN. SULABH JEE NE SAHEE KAHA HAI WORD VERIFICATION HATA LEN

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  5. दरवेश साहब,
    आपका सानिध्य पाना ब्लॉग जगत के लिए और मेरे लिए खुशनसीबी है
    आपके द्वारा संपादित गजल के बहाने के विषय में मुझे पहले भी ब्लॉग जगत से ही पता चला था, देखें ...

    ---------------------------------------------
    सभी दोस्तों को सलाम ........!
    कुछ अर्सा पहले अंशु प्रकाशन दिल्ली की तरफ़ से
    मशहूरो मारूफ़ ग़ज़लकार, एक आलिम फ़ाज़िल शख्सियत
    उस्तादे-मोहतरम जनाब 'दरवेश' भारती जी कुशल सम्पादन में
    एक नायाब पत्रिका "ग़ज़ल के बहाने" मंज़रे-आम पर आई ....
    ग़ज़ल में रूचि रखने वालों के लिए ये रिसाला एक एहम दस्तावेज़
    साबित हो रहा है
    ---------------------------------------------

    और आज आपको आपके ब्लॉग के साथ यहाँ पा कर बहुत अच्छा लगा

    मैं ब्लॉग जगत पर ही श्री पंकज सुबीर जी से गजल लिखना सीख रहा हूँ www.subeerin.blogspot.com

    आज कथा चक्र पर आपकी पत्रिका से सम्बंधित पोस्ट पढ़ी
    क्या यह पुस्तक निःशुल्क है ?
    इसके मूल्य के विषय में तो यही लिखा है या फिर एक अंक के विषय में बताया गया है
    क्या यह पुस्तक इलाहाबाद में प्राप्त की जा सकती है
    अगर आप इस विषय में एक पोस्ट लगा दें तो आभारी रहूँगा
    क्योकि प्रश्न बहुत हैं
    पुराने अंक
    मूल्य
    सदस्यता
    पाने का तरीका
    पैसा भेजने का तरीका आदि

    एक शेर जो मुझे बहुत पसंद हैं :)

    जाने क्यों दरवेश आजकल
    तू से तुम फिर आप हो गया

    वाह

    - आपका वीनस केशरी

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  6. Gazal ke Bahane ek Sarthak disha ko ujgaar karti Manney Darvesh ji ki margdarshak Patrika
    is baat par gaur karne par majboor karti hai..

    कथ्य तो है पुरज़ोर, मगर
    छन्दों का भूगोल गया
    bahut khoob!!

    कैसे वो थिर होता मन से
    आसन से जो डोल गया

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