शुक्रवार, 4 जून 2010

वही दिली मुद्दा रहा है
जो आज हमसे खफ़ा खफ़ा है
उछाल लहरों का कह रहा है
कि चाँद का रुख खिला खिला है
लिए है जितनी विनम्रता वो
कठोरता उतनी ओढ़ता है
कभी था मरकज़ जो तज़किरों का
उन्ही से वो आज लापता है
रहे न सांप और न लाठी टूटे
यही सियासत की दक्षता है
न हो परेशान तू सुनकर इसको
तेरे सताये की ये सदा है
वो शे'र की दाद पाए 'दरवेश'
नवीन शैली में जो बंधा है

11 टिप्‍पणियां:

  1. न रहे सांप और न लाठी टूटे
    यही सियासत की दक्षता है ...
    बहुत सही कहा ....

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  2. "वो शे'र की दाद पाए 'दरवेश'
    नवीन शैली में जो बंधा है"
    वाह

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  3. आदरणीय दरवेश भारतीजी
    प्रणाम !
    ब्लॉग कि दुनिया में आपका हार्दिक स्वागत है !
    शानदार मत्ला है …
    वही दिली मुद्दआ रहा है
    जो आज हमसे खफ़ा खफ़ा है

    पूरी ग़ज़ल रवां दवां है ।

    शस्वरं पर आकर मुझे भी धन्य करें । आप जैसे ग़ज़लगुरू की प्रतिक्रिया मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है ।
    - राजेन्द्र स्वर्णकार
    शस्वरं http://shabdswarrang.blogspot.com

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    वर्ड वेरिफिकेशन क्या है और कैसे हटायें ?

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    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

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  8. उछाल लहरों का कह रहा है
    कि चाँद का रुख खिला खिला है


    भी था मरकज़ जो तज़किरों का
    उन्ही से वो आज लापता है

    रहे न सांप और न लाठी टूटे
    यही सियासत की दक्षता है ...

    ज़िंदगी और उसकी ठोस धरातल से जुड़े हुए
    ऐसे नायाब अश`आर, सिर्फ और सिर्फ आप सरीखे
    मान्यवर गुरुवर की लेखनी से ही निकल सकते हैं
    हम पढने वाले तो ढंग से सताइश भी नहीं कर पाते , क्योंकि
    ऐसे उम्दा लेखन की तारीफ़ के लिए हमें अलफ़ाज़ की कमी
    आड़े आ जाती है .......
    बस नमन करता हूँ .
    'मुफ़्लिस'

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  9. कलाम अच्छा, बहुत नयापन
    कहाँ हो? कुछ क्या नया लिखा है?

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